'नागफनी की बेल और कर्म'
अहसास नही कर पाई थी कि
कुछ ईश्वर प्रद्दत अभिशप्त तत्व
मेरे अंग प्रत्यंग में निहित हैं
जो कभी मुझे सही ठहराने ही
नहीं देंगे।
पैदा होने से पहले ही
शायद कर चुकी थी गुनाह,असहनीय कर्म इसलिये
पालिता माँ को छोड़कर
कभी किसी ने वो सम्मान
स्नेह नहीं किया
जिसकी हक़दार थी।
चीरती नज़रें हर
क़दम पर झेलती रही।
हर सम्भव कोशिशो के बावजूद भी
खुद को कभी सही
सिद्ध नहीं कर पाई,.....
हर एक को प्यार किया मगर बदले में उफ़्फ़्फ़! तिरस्कार ,और तंज़ भरी निगाह ,
मगर जाने क्यों खत्म न हो सकी ?
मृग तृष्णा सी भटकती ,
मैं कांटा थी
हूँ और शायद रहूँगी।
तो क्यों बेजान बोझिल जिस्म को
ढोती फिरती हूँ ?
इतने बोझ लेकर कब तक,
जब ख़ुद मे मैं ही अभिशप्त हूँ तो
किसी को भी क्यों कोई दोष दूँ,क्यों ?
दोष स्वयं का है, निस्वार्थ प्रेम की
स्पृहा स्वयं की है,
चुनाव भी स्वयं का
तो कोई दोषी कैसे हुआ ?
वो झंझावात हूँ जिसमें 49 पवन देवों ने
बल लगा रखा है फिर कैसे
थमे झंझावात
मलय समीर बनके किसी
विचार उपवन को
महकाने का सोच भी कैसे सकती हूँ ?
अगर सोचती हूँ तो
कोरी मूर्खता
और बेवकूफ़ी ही है।
मैं कांटे जैसा दुर्गन्ध युक्त वो फूल हूँ
जो किसी को भी सुगन्ध नहीं दे सकता
शायद, दुर्गन्ध से अटा
ही सकता है।
पैदाइश से अब तक लगता है हर
किरदार में मैं ही दोषी हूँ
सिर्फ़ मैं
क्योंकि मैं पैदा ही सड़क पर फैकने के
लिये हुई थी,
और ठोकरें खाने के लिए।
नागफनी की बैल जो ख़त्म
नहीं होती
जीवन के रेगिस्तान में
भी बेमक़सद फलती-फूलती
जाती है, फिर भी
ख़ुद पर जाने क्यों गर्व है ?
शायद कांटे बनकर रहने
से कठोर बन चुका है वजूद
जो पंच तत्व में
सहज विलीन नहीं
हो पायेगा।
डॉ.यासमीन ख़ान
अहसास नही कर पाई थी कि
कुछ ईश्वर प्रद्दत अभिशप्त तत्व
मेरे अंग प्रत्यंग में निहित हैं
जो कभी मुझे सही ठहराने ही
नहीं देंगे।
पैदा होने से पहले ही
शायद कर चुकी थी गुनाह,असहनीय कर्म इसलिये
पालिता माँ को छोड़कर
कभी किसी ने वो सम्मान
स्नेह नहीं किया
जिसकी हक़दार थी।
चीरती नज़रें हर
क़दम पर झेलती रही।
हर सम्भव कोशिशो के बावजूद भी
खुद को कभी सही
सिद्ध नहीं कर पाई,.....
हर एक को प्यार किया मगर बदले में उफ़्फ़्फ़! तिरस्कार ,और तंज़ भरी निगाह ,
मगर जाने क्यों खत्म न हो सकी ?
मृग तृष्णा सी भटकती ,
मैं कांटा थी
हूँ और शायद रहूँगी।
तो क्यों बेजान बोझिल जिस्म को
ढोती फिरती हूँ ?
इतने बोझ लेकर कब तक,
जब ख़ुद मे मैं ही अभिशप्त हूँ तो
किसी को भी क्यों कोई दोष दूँ,क्यों ?
दोष स्वयं का है, निस्वार्थ प्रेम की
स्पृहा स्वयं की है,
चुनाव भी स्वयं का
तो कोई दोषी कैसे हुआ ?
वो झंझावात हूँ जिसमें 49 पवन देवों ने
बल लगा रखा है फिर कैसे
थमे झंझावात
मलय समीर बनके किसी
विचार उपवन को
महकाने का सोच भी कैसे सकती हूँ ?
अगर सोचती हूँ तो
कोरी मूर्खता
और बेवकूफ़ी ही है।
मैं कांटे जैसा दुर्गन्ध युक्त वो फूल हूँ
जो किसी को भी सुगन्ध नहीं दे सकता
शायद, दुर्गन्ध से अटा
ही सकता है।
पैदाइश से अब तक लगता है हर
किरदार में मैं ही दोषी हूँ
सिर्फ़ मैं
क्योंकि मैं पैदा ही सड़क पर फैकने के
लिये हुई थी,
और ठोकरें खाने के लिए।
नागफनी की बैल जो ख़त्म
नहीं होती
जीवन के रेगिस्तान में
भी बेमक़सद फलती-फूलती
जाती है, फिर भी
ख़ुद पर जाने क्यों गर्व है ?
शायद कांटे बनकर रहने
से कठोर बन चुका है वजूद
जो पंच तत्व में
सहज विलीन नहीं
हो पायेगा।
डॉ.यासमीन ख़ान
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