हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा।

Friday, 3 February 2017

Yunush khan patrkar

खफा भी करते है वफा भी करते है

 अपने प्यार को वो आंखो से बयां भी

 करते है ना जाने कैसी नाराजगी है

 उनकी हमसे हमें खोना भी चाहते है

 और पाने की दुआ भी करते है !✍

          🌹आदाब जी🌹
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सचिन साधारण

ये बार बार अब नही होगा,
दिल ये लाचार अब नही होगा,
कोई आ जाऐ आके दिल तोड़े,
किसी से प्यार अब नही होगा।

सचिन साधारण
7786957386
******
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डॉ.यासमीन ख़ान

'नागफनी की बेल और कर्म'

अहसास नही कर पाई थी कि
कुछ ईश्वर प्रद्दत अभिशप्त तत्व
मेरे अंग प्रत्यंग में निहित हैं
जो कभी मुझे सही ठहराने ही
नहीं देंगे।

पैदा होने से पहले ही
शायद कर चुकी थी गुनाह,असहनीय कर्म इसलिये
पालिता माँ को छोड़कर
कभी किसी ने वो सम्मान
 स्नेह नहीं किया
जिसकी  हक़दार थी।
चीरती नज़रें हर
क़दम पर झेलती रही।
हर सम्भव कोशिशो के बावजूद भी
 खुद को कभी सही
सिद्ध नहीं कर पाई,.....

 हर एक को प्यार किया मगर बदले में उफ़्फ़्फ़! तिरस्कार ,और तंज़ भरी निगाह ,
मगर जाने क्यों खत्म न हो सकी ?
मृग तृष्णा सी भटकती ,
मैं कांटा थी
 हूँ और शायद रहूँगी।
 तो क्यों बेजान बोझिल जिस्म को
ढोती फिरती हूँ ?
इतने बोझ लेकर कब तक,
जब ख़ुद मे मैं ही अभिशप्त हूँ तो
किसी को भी क्यों कोई दोष दूँ,क्यों ?
दोष स्वयं का है, निस्वार्थ प्रेम की
 स्पृहा स्वयं की है,
चुनाव भी स्वयं का
तो कोई दोषी कैसे हुआ ?
 वो झंझावात हूँ जिसमें 49 पवन देवों ने
बल लगा रखा है फिर कैसे
थमे झंझावात
मलय समीर बनके किसी
विचार उपवन को
महकाने का सोच भी कैसे सकती हूँ ?
अगर सोचती हूँ तो
कोरी मूर्खता
और बेवकूफ़ी ही है।

मैं कांटे जैसा दुर्गन्ध युक्त वो फूल हूँ
 जो किसी को भी सुगन्ध नहीं दे सकता
शायद, दुर्गन्ध से अटा
ही सकता है।

पैदाइश से अब तक लगता है हर
 किरदार में मैं ही दोषी हूँ
सिर्फ़ मैं
क्योंकि मैं पैदा ही सड़क पर फैकने के
लिये हुई थी,
और ठोकरें खाने के लिए।
नागफनी की बैल जो ख़त्म
नहीं होती
जीवन के रेगिस्तान में
भी बेमक़सद फलती-फूलती
जाती है, फिर भी
ख़ुद पर जाने क्यों गर्व है ?
शायद कांटे बनकर रहने
से कठोर  बन चुका है वजूद
जो पंच तत्व में
सहज विलीन नहीं
हो पायेगा।
डॉ.यासमीन ख़ान
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डॉ.सरला सिंह

[1:48 PM, 2/2/2017] +91 96504 07240: आजादी
उसने पूछा आजादी के मायने,
क्या है आजादी ?
आजादी स्वतन्त्र होना है
ना कि स्वछन्द ।
बन्धन हमारे ऊपर होता है
समाज का , विचार का
धर्म का ,व्यवहार का ।
यदि बन्धन न हों
हम जानवर सदृश होंगे।
नैतिकता का बन्धन न हो,
अनैतिक कहलाए जायेंगे।
समाज का बन्धन न हो ,
कहीं भी कुछ भी डर न होगा ।
सरेआम चोरी डकैती लूटपाट
करनेवाले यही तो हैं ।
आजादी के मायने है
दासता न हो किसी की ।
गुलाम न हो किसी के ।
आजादी का स्वछन्दता नहीं,
नैतिकता का हनन करना नहीं।
मूल्यों का अवमूल्यन नहीं ।
मनमानी करना तो नहीं ।
आजादी आजादी है,
स्वछन्दता नहीं।
चाहे विचारों का हो ,
पहनावे का हो ।
नैतिकमूल्यों से परे ना हो,
वही आजादी है ।

  डॉ.सरला सिंह ।
 दिल्ली                      

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सुरेश मिश्र

नेताओं में छिड गई, पुनः जुबानी जंग
गिरगिट जैसे आज सब, लगे बदलने रंग
लगे बदलने रंग, भंग पीकर के बोलें
सदा लूटते लोग, आज खाएं हिचकोले
कह सुरेश इनसे कुछ सीखो अभिनेताओं
'गिरगिट-खटमल' तक तुमसे हारे नेताओं ।।

सुरेश मिश्र
09869141831
09619872154
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साहिल⁠⁠⁠⁠

कुछ सबब कुछ वास्ता बनता रहा
ज़िंदगी का सिलसिला चलता रहा

पाँव फिसलन रहगुज़र पर हरक़दम
वक़्ते-नाज़ुक हमक़दम मिलता रहा

आँख में हर रात इक जुगनू नया
नौ सहर की ताक में जलता रहा

वक़्ते-रुख़्सत चश्मेनम से देखना
ख़्वाब की ताबीर में ढलता रहा

मौजों की तड़पन का आलम याखुदा
पूर्णिमा का चाँद शब चढ़ता रहा

फूल की खुशबू तबीयत का करम
गुल मगर क्यूँ खार सा चुभता रहा

पाँव के छालों में मंज़िल की तलब
हिज्र दिल में फूलता फलता रहा

आँख से ओझल हुआ जब कारवाँ
कान सुर बाँगे-दरा बजता रहा

खुदफ़रेबी का जुनूँ यूँ सर चढ़ा
जाँ-निसारी का हुनर घुलता रहा

देख ‘साहिल’ शख़्स वह मक़बूल है
रौ में जो अपनी सदा बहता रहा

साहिल⁠⁠⁠⁠
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कवि आर.पी.सारंग

😡 खूब निचोड़ो 😡
कविता का दूसरा भाग
🙏🙏

हंसने-रोने,चलने-फिरने,
पर इच्छा शुल्क लगाओ!
ये सांसें आती-जाती हैं,
इन पर सुविधाशुल्क बढ़ाओ!!
फूलों की खुशबू बहती हवा,
इनपे आवश्यकता शुल्क लगाओ!
खांसी छींक और खर्राटों पर,
आपात शुल्क बढ़ाओ!!
बच्चों की किलकारी पर,
बीबी की हुशियारी पर!
थोड़ा सा अधिभार बढ़ाओ!
निर्धन की आहों पर!
घायल के घावों पर!
थोड़ा सा प्रभार बढ़ाओ!!!
😡😡😡😡😡
परखके जनता जान सकी है,
कितने घटिया तुम निकले!"'''"'"
खूब निचोड़ो इस नीबू को,
जब तक इसमें रस निकले!!!
🙏🙏🙏
कवि आर.पी.सारंग
एटा (उत्तर प्रदेश)
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शायर🔸अंदलीब शादानी

☀ सुबह ☀ का ☀ सलाम ☀

तुम चाँदनी हो फूल हो नग़्मा हो शेर हो

अल्लाह-रे हुस्न-ए-ज़ौक़ मिरे इंतिख़ाब का

📝🔹शायर🔸अंदलीब शादानी🔸🔹                        
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एस के सागर

लिख भेजे हैं
अरमान कई
तुम पढ़ लेना
बैठकर तन्हा,

कुछ लम्हों में बीते हैं,
कुछ अश्कों में भीगे हैं,
कुछ सोचों में डूबे हैं,
कुछ यादों में उलझे हैं,

कुछ दिल से निकले हैं,
कुछ सीने में उतरे हैं,
कुछ जोर से पकड़े हैं,
कुछ आहें में उभरे हैं,

कुछ हिज्र में तड़पे हैं,
कुछ वस्ल में गुजरे हैं,
कुछ बूंद से बिखरे हैं,
कुछ ओस से नखरे हैं,

कुछ दर्द के टुकड़े हैं,
कुछ हंसते मुखड़े हैं,
कुछ प्यारे लगते हैं,
सागर के कत्तरे हैं।

✏ एस के सागर
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अक्षय 'अमृत'

मुझे मालूम है मुझको समझना है ज़रा मुश्किल
मगर जिसने मुझे समझा उसी को मैं हुआ हासिल

कभी इंसानियत के नाम पर सब जान देते थे
कहो कैसे ये दुनिया अब बनी इंसान की क़ातिल

किसी भी चीज़ को पाना नहीं आसान होता है
उसे पाना अगर है तो बनो उस चीज़ के काबिल

नहीं मालूम था खुद की लड़ाई खुद से होनी है
नहीं तो आज कदमों में पड़ी होती मेरी मंज़िल

किसी को दिल से चाहो तो कोई उम्मीद मत रखना
यूँ उम्मीदों के चक्कर में फ़क़त बस टूटता है दिल

ये शायर आँसुओं को भी ग़ज़ल का रूप देता है
मज़ा लेकर पुनः घर लौट जाती है यहाँ महफ़िल

~ अक्षय 'अमृत'
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आदाब जी🌹

*नज़रिया बदल के देख, हर तरफ नज़राने मिलेंगे

*ऐ ज़िन्दगी यहाँ तेरी तकलीफों के भी दीवाने मिलेंगे..!✍

         🌹आदाब जी🌹
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आदाब जी

बहुत रंग भी तस्वीरें ख़राब करते है ,

ग़ौर से सुनिए तो अंधेरे भी बात करते है ✍
       
             🌹आदाब जी🌹
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Thursday, 2 February 2017

राम निवास कुमार

कृपा रहे ईश की तुमपर,
तुम बढ़ो दिन-रात
मैं चाहता हूँ तन-मन से,
विहँसे नवल प्रभात ।

बाधा-विघ्न न आवै पथ पर,
रहो सदा गतिमान
नन्दन-वन सा सुरभित हो,
जीवन का उद्यान ।

बढ़े चलो जीवन भर तुम,
हर पल नया आयाम
विवेकानंद  आदर्श हैं  तेरे,
करो संघर्ष सुवह औ शाम ।

दुनिया में युवा बहुत हैं,
उनके कितने नाम
निकल जाओ तुम सबसे आगे,
कृपा करें श्रीराम ।

दल पर दल खोलता पूर्ण हो,
खिलता जैसे फूल,
तैसे ही खिलो श्रृंग पर,
हिले न तिलभर मूल ।

कलम शारदा हाथों से मैं,
करता हूँ अभिषेक
पूरे भारतवर्ष में फैले,
गुण ज्ञान और विवेक

राम निवास कुमार
लेखक-सह-कवि
दुर्गापुरी, मालीघाट
मुजफ्फरपुर ✍
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राम निवास कुमार

🌹नशामुक्त बिहार🌹

हो रही तारीफ बड़ी
आज बिहार सरकार की,
नशामुक्त बिहार हुआ
खुशियां लौटीं परिवार की ।

सोचना भी आसान नही था
बिहार नशामुक्त  हो जाएगा,
दिखा दिया पूरा कर आपने
अब नशा नहीं चल पाएगा ।

जीत लिया भारत का दिल
अब घर-घर में खुशहाली है,
बिहार बनेगा रोल मॉडल
अब सरकार शेष की बारी है ।
हर्षित है समाज बिहार का
लोग बड़े आनंदित हैं,
तारीफों के बंध रहे पुल
कुछ लोग बड़े अचंभित हैं ।

प्रीति बढ़ी अबाल वृद्ध से
हर घर में खुशहाली है,
मातु-पिता बहु-दादी सबको
मिलती चाय की प्याली है ।

तकलीफ बहुत तब होती थी
जब नशे में पीटी जाती थीं,
पर दुःख कहने में अपनी माँ
बहनें बहुत शर्माती थीं ।

जितने मुखड़े उतने मुक्तक
शब्द लगे पड़ने अब कम,
दिखा बिहार सरकार ने जज्बा
पेश किया अपना दमखम ।

अब नही ऐसी कोई शिकवा,
हो गयी उनकी बोलती बंद,
मानो रामबाण से घबराकर,
भागा जैसे कुटिल जयंत ।

बढ़ा बिहार का मान-सम्मान
चतुर्दिक है सादर अभिनन्दन,
कालजयी इस तेरी कृति का
करते हैं हम शत-शत वंदन ।
         🙏
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Kavi Raam Newas हिन्दुस्तान की माटी पर

 हिन्दुस्तान की माटी पर

हिन्दुस्तानी रहना होगा
यहां की माटी में रमकर
हिन्दुस्तानी बनना होगा
------
इस माटी की आव हवा मे
जहर नहीं घुलने देंगे
इस माटी का शॉर्य पराक्रम
कभी नहीं धुलने देंगे
------
ऋषि मुनियो की तपस्थली
देवो की वरदान है ये
गौ गीता गंगा मां से
देवभूमि महान है ये
------
मातृभूमि के साधक हैं हम
चुनौतियां स्वीकार हमें
मौत हमें क्या मारेगी
क्या देगी ललकार हमें
----
मैं अदना सा कलमकार हूं
है हैसियत नहीं बड़ी
हिन्दुस्तान है सीने में
लिखता हूं बस खड़ी खड़ी
----
कहे कवि उदय शंकर
अध्याय नया हम लिखेंगे
इस माटी के कण-कण में
सच्चाई सदा हम लिखेंगे
-----
देख रहा हूं मैं क्रांति की
"उदय" दिखाई देती है
मुझको माटी की कण कण से
जयघोष सुनाई देती है
-----
आजाद हिन्द में फिंरंगीयों से
प्यार दिलों में जिन्दा है
ईसाईयत की चाल में फंसकर
सारा भारत शर्मिदां है
-----
हम हिन्दुओं को हरगिज
ईसाई नहीं होने देंगे
हिन्दु ओर हिन्दुत्व की
गरिमा और नहीं ढहने देंगे
-------------------------------
जय हिन्द जय मां भारती
उदय शंकर चौधरी नादान
7738559421                      
[2:22 PM, 2/1/2017] Kavi Raam Newas Vihar Add: 🌷माँ का माहात्म्य🌷

दर्द हमें जब होता है,
मुख से माँ निकलता है
बच्चों के दुःख से,
माँ का दिल तड़पता है ।

माँ एक महाशक्ति है,
माँ ईश्वर की भक्ति है
अपने बच्चों की खातिर,
माँ कुछ भी कर सकती है ।

माँ बिना यूँ लगता है,
जीवन में क्या रखा है
झूठा प्यार है लोगों का,
माँ का प्यार ही सच्चा है ।

कितने ही दर्द सहे,
इंसानों को जन्म दिया
अपने खून से माँ,
तूने हमको सींच दिया ।

संसार में तुझ जैसा,
और नहीँ कोई दानी है
ममता की मूरत है तू,
करुणा की बड़ी निशानी है ।

बच्चों की ख़ुशी के लिए,
हर सुख का त्याग किया
संस्कार तुम्हीं ने दिए,
शिक्षा और ज्ञान दिया ।

गुरुओं की गुरु है तू,
तेरी अलग कहानी है
ममता की मूरत है तू,
करुणा की बड़ी निशानी है ।

ममता का रस पीने,
प्रभु ने अवतार लिया
तेरी गोद  में खेले वे,
उन्होंने भी अमृतपान किया ।

तेरे तप की महिमा को,
वेदों ने बखानी है
ममता की मूरत है तू,
करुणा की बड़ी निशानी है ।

ब्रह्माण्ड में न दूजा कोई,
इक माँ की शानी  है
ममता की मूरत है तू,
करुणा की बड़ी निशानी है ।

दुनिया की सभी माओं को नमन
🙏
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