हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा।

Thursday, 2 February 2017

राम निवास कुमार

मत करो बदनाम बिहार को,
अनुरोध आज मैं करता हूँ
है खूबसूरत प्रदेश हमारा,
संग तेरे मैं चलता हूँ ।

किया खात्मा नशा बिहार से,
आप भी कर दीजिए
मिटा नशा भारत से बिलकुल,
स्वमान बढ़ा अब लीजिए ।

माना थोड़ा पिछड़ गए हम,
आप मदद कर दीजिए
माँग रहे वर्षों से हम,
अब तो दर्जा दे दीजिए ।

मेहनतकश बिहार की जनता,
छल-कपट नहीं ये जानती,
करती है अनुरोध आपसे
हक ये अपना मांगती ।

छात्र-छात्रा नाम बिहार का,
जग में रौशन करते हैं
क्यों कर रहे बदनाम बिहार को,
जब लाज हम आपकी रखते हैं ।

सत्य अहिंसा ज्ञान का हमने,
जग को पाठ पढ़ाया है
जब पड़ी जरूरत शौर्य बल की,
दुश्मन को धूल चटाया है ।

इतिहास आदिकाल में जाकर,
नाम बिहार पढ़ लीजिए
मांग रहे वर्षों से हम,
अब तो दर्जा दे दीजिए ।

ये आवाज नहीँ सीएम की अपनी,
बिहार ने ऐसा बोला है,
चोर, उचक्के, माफिया का मन,
व्यवस्था देखकर डोला है ।

मत करो बदनाम बिहार को,
अनुरोध आज मैं  करता हूँ
है खूबसूरत प्रदेश हमारा,
संग तेरे मैं चलता हूँ ।

रचना✍
राम निवास कुमार
मुजफ्फरपुर (बिहार)
मगसम 12001/2016
94 700 27048
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राम निवास कुमार

कलमकारों को समर्पित🌹
---------------------
कलमकारों की लाल कलम से
आग निकलनी चाहिए,
मंद पड़ा जब देश का दीपक
तो ज्वाला जलनी चाहिए।

शांत हों जब सागर की लहरें तो तूफ़ान मचलना चाहिए,
कलमकारों की लाल कलम से आग निकलनी चाहिए।

जब मंद हुई देशभक्ति की
धारा
तो संवेग बढ़ जाना चाहिए,
और जब सुस्त पड़ा युवकों का तेज़,
तो स्वाभिमान जगाना चाहिए।
कलमकारों की लाल कलम से आग निकलनी चाहिए।

जब दुशमन सीमा पर आँख दिखाए
तो प्रबल भुजदंड मचलना चाहिए,
जब प्रधानसेवक ने है आवाज़ लगाई,
तो हमें एकजुट हो जाना चाहिए,
और सेनानायक  जब हुंकार भरे,
तो एकदम कुच कर जाना चाहिए।
कलमकारों की लाल कलम से आग निकलनी चाहिए।

दुश्मन सुन ले कान  खोलकर,
बात एक समझाता हूँ,
आ जाओ हमसे गले मिला लो,
इसी में भला तुम्हारा जानता हूँ।
अरे! ये पहले वाला इंडिया नहीं,
ये मोदी वाला भारत है।
फिर भी समझ में आये नही,  तो समझो सबकुछ गारथ ही  गारथ है।

कलमकारों की लाल कलम से आग निकलनी चाहिए,
मंद पड़ा जब देश का दीपक तो ज्वाला जलनी चाहिए।

      जय हिन्द !🇮🇳

राम निवास कुमार✍
दुर्गापुरी, मालीघाट
मुजफ्फरपुर।
94 700 27048
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शायर मेहताब

आज मै भी उससे रुसवा हुआ"
............."शायर मेहताब".............
_
आज मै भी उससे रूसवा हुआ,,
उसकी गली नही गया तो क्या हुआ...
_
उम्रे-इश्क़ में ये पहली मर्तबा हुआ,,
उस गली की ख़ाक से मै जुदा हुआ...
_
आगे मिलती थी सीधे मुह नफरत,,
आज यूँ नफरत जगा के अच्छा हुआ...
_
उसे देखने की हसरत गिरवी रखी,,
ग़म उसका उधार पाकर अच्छा हुआ...
_
वो मेरा इंतजार नही करते मेहताब,,
मै फिरभी हर शाम उस गली की सदा हुआ...
_
#शायर_मेहताब
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ज़िंदगी के दर्द मे कोई अजनबी हमारा

ज़िंदगी के दर्द मे कोई अजनबी हमारा

 नही होता, अगर दिल प्यासा हो तो

 पानी से गुज़ारा नही होता. जब भी

 कोई देखे हमारी ये बेबसी, हम सबके

 हो जाते हे दुनिया मे, पर कोई हमारा

 नही होता. ✍

        🌹आदाब जी🌹
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सोहेल खान नवाबी

आपको और आपके पुरे परिवार
को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
😊🙏🏻🌹 सुप्रभात 🌹🙏🏻😊

  सोहेल खान नवाबी
Nsui छात्र नेता बांगड़ कॉलेज पाली
8739933132
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बबुआ

नहलाते हैं उसी लाश को, हम तीन बार यारों
मर गया जो प्यास से, इक घूँट पानी के लिये

🌹बबुआ
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महेंन्द्र जैन मनु

पराग कलियों का देख ,
भौरें मंडरानें लगें !
अध खिली खुशबूँ से ,
पराग लेने लगें !
शबाब पर आने दो भौरों
से कह देना 'मनु' !
शरारत अच्छी नहीं वो ,
फिर से आने लगें !
✍💞✍💞✍💞✍
महेंन्द्र जैन मनु
इन्दौर. (म०प्र०)
९८२७६१०५००
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कुमार सचिन🌹

                        🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
मैनें  सांवरि   सूरत  देखी  पूरा  दर्पन चूम लिया |
तेरी इक बँशी के धुन पर सारा जीवन झूम लिया |
तू तो मस्त मलंग था कान्हा मेरे दिल के अन्दर ही,
तेरी  परछाई के पीछे सारा   मधुवन घूम   लिया ||

🌹कुमार सचिन🌹
📲 9455008700
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Kumar Sachin

खिला इक फूल सा हूं मैं तेरा दिल मेरा उपवन है.
तेरे नयनों के सागर में मेरे चेहरे का दर्पन है.
मैं आंखें मूंद कर यूं ही बिरह में रोज सोता हूं,
कभी ख्वाबों में तू आये वहीं पतझड़ में सावन है.

Kumar Sachin
9455008700

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मनोज"मोजू"

न राणा वाला जोश बचा ,न वीर शिवा सा होश दिखे
हर बातो पे चुप्पी साधे ,क्यों इतना बेहोश दिखे

जिसने भी जो बोला हमने शीश झुका के मान लिया
अपने ही देवो का हमने जी भर कर अपमान किया
गैरो की बाते मानी पर , अपनों पे न कान दिया
बाँट रहे वो हमको ही इस ,ओर कभी न ध्यान दिया
आन बान पर मिटने वाला कही न मुझको रोष दिखे
हर बातों पे चुप्पी साधे , क्यों इतना बेहोश दिखे

मनोज"मोजू"
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सुशीला जोशी

#  एक गीत -- मौजे  #
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

 तवक़्क़ो न मौजो से
कुछ भी करो
ये तुम से तुम्हारी
हँसी छीन लेंगी ।।

ये मौजे हवाओ से
मजबूर  हैं
इधर से उधर तक
यूँ ही घूमती है
मस्ती में आये तो
पग चूम लेती
प्रभावों में आ कर
यूँ ही झूमतीं हैं

न मांझी को खोजो
न साहिल को ढूंढो
ये पैरो तले की
जमीं छीन लेंगी ।।

बहुत तेज रफ़्तार
इनमे बसी है
किसी का ये कुछ भी
नही देखती हैं
छोटा बड़ा हो
या हल्का हो भारी
किसी के भी आंसू
नही पौछती हैं

न मंजिल को  आंको
न मंजर को ताको
ये  तुम से तुम्हारा
यकीं छीन लेंगी ।।

निहायद हठीली
ये ज़िद। में पली है
सूखे पे अपना
 निशां छोड़ती  हैं
किनारों से टकरा के
जब लौटती हैं
बादरंगियो से
उन्हें जोड़ती हैं

न इजहार मानो
न पतवार थामो
मकानों से उनके
मकीं छीन लेंगी ।।

◆  सुशीला जोशी
    मुजफ़्फ़रनगर
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महेन्द्र श्रीवास्तव

आँचल उड़ा दिये बसंती वयार ने  ,
भेद सारे खोल दिये बसंती वयार ने
दिल की धड़कने फिर होने लगीं तेज,
अमृत रस घोल दिये बसंती वयार ने  !!


****महेन्द्र श्रीवास्तव
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ललित कुमार

खामोशी
तन्हा-तन्हा जब भी बैठूँ,
गाने लगती खामोशी।
चाहे दुनिया साथ छोड़ दे,
साथ न छोड़े खामोशी।

अंतर्मन में जब कोलाहल
शांति दिलाती खामोशी।
कथन कभी कटुता भी पाता
प्रेम ही पाते खामोशी।

जीवन के आपाधापी में
कोलाहल का जब बदमाशी।
खामोशी खम ठोक खनकती
खनखन करती खामोशी।।

भाषण,प्रवचन सब ध्वनि प्रदूषण
मौन ही होता पर्यावरण हितैषी।
खामोशी ध्यान देवत्व दिलाए
"ललित" मन भाये खामोशी।।
ललित कुमार झा,2/2/17
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नवल पाल प्रभाकर

बसंत जी।

पैराें में मखमली जूतियां
सिर पर पगड़ी फूलों की
हरियाली रूपी ओढ़ काम्बली
आ गए महंत बसंत जी।
        बयार चले ठंडी होकर
        तन में कंपकंपी बंध जाती
        करती मंत्रमुग्ध हवा
        सांसों में समाई है जाती
उत्तर से आने वाली हवा
ठंड है अधिक बढ़ाती ।
हरियाली रूपी ओढ़ काम्बली
आ गए महंत बसंत जी।
         ऐसी प्यारी ऋतु का
         करते हैं स्वागत जीव-जन्तु
        भरे उमंग में रहते हैं
        थर-थर कांपते हैं तन्तु
रोंए ओर खडे हो जाते
ऐसी ठंड है बढ़ जाती ।
हरियाली रूपी ओढ़ काम्बली
आ गए महंत बसंत जी।
          पत्ते लय-सुर-ताल मिलाते
         थिरक-थिरक नृत्य हैं करते
        भर अंजली बिखेरते पत्ते
        लगते हैं मानो हवा में तैरते
हंसी ठिठोली करते हैं जब
हवा तेज है हो जाती ।
हरियाली रूपी ओढ़ काम्बली
आ गए महंत बसंत जी।
       -ः0ः-
नवल पाल प्रभाकर
मगसम 2622/2016
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अमित कुमार रावत

✍✍एड.अमित कुमार रावत प्रधानाचार्य

मेरा यह संविधान है
******
धर्म जाति  वर्ण में  नहीं समान है
पर समत्व भाव का यहाँ विधान है
खूब पढो खोज करो बन्दना करो
वोट बेचने की यही  तो दुकान है
भाई मेरे देश का ये संविधान है !!

आज  हमें देश  का विकास  चाहिए
अति सुयोग्यतम अरुण प्रकाश चाहिए
अम्ब अधर को अगर सुहास चाहिए
संविधान  का  सर्वनाश   चाहिए
यहाँ योग्यता का कहाँ अंशदान है,
भाई मेरे देश का ये संविधान है !!

धर्म  निरपेक्ष  धर्म हीन  बन गया
मुख्य धर्म दलित दुखी दीन बन गया
संविधान आज  सुनसान रो रहा
भ्रष्ट नेतृ वर्ग देश को ही खा गया
देश आज एक  भूतहा मकान है
भाई मेरे देश का ये संविधान है !!

✍एड.अमित कुमार रावत
                         "प्रधानाचार्य"
जय माँ पठा देवी इण्टर कालेज पठा,ललितपुर
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